मुझे याद है
तब से आज भी
कितनी बलिष्ठ भुजाये थी ओ.
ऊचा कद, जिन पे कुदराया करता था मै.
ओ प्यार बरसाती आँखे,
मेरी जरा सी अस्वस्थता पर आंसू उलेड़ पड़ती थी.
मुझे वह पल भी याद है
एक बार जब मेरी शैतानी पर लाल हुई थी आंखे
टूट कर पड़ी थी मेरे बदन पे उनकी भुजाये
चरमरा उठा था पूरा बदन.
उफ़! आनंद आज वो उतनी शसक्त क्यप नहीं है?
कौन जानता था क़ि...
आता हुआ दरिया जाता हुआ दरिया भी है
वो भुजाये, बलिष्ठ बदन,
आहिष्ट आहिष्ट मेरी ही आँखों के सामने,
मुझी से चुरा कर अपनी बलिष्ठता खोता रहा
और मै तमाशे क़ि तरह उसे देखता रहा
उफ़! आनंद!! कहाँ खबर थी किसी को?
तुम इतने बुद्दू हो..शायद उदार भी
कौन जानता था क़ि..
आता हुआ दरिया जाता हुआ दरिया भी है
फिर वो भुजाये . नो बदन
जर्जर होता गया मैंने महसूस भी किया
शायद उन्होंने भी..
कोई कुछ नहीं बोला, देखते रहे वक्त क़ि ददागिरी को
जैसे जानते थे क़ि ऐसा होना ही था
उफ़! आनंद!! तुम इतना लाचार थे
तुम्हे तो पता था क़ि ऐसा नहीं होना था
काश तुमने कहा होता क़ि मै जनम न लूगा
मै नहीं देखूगा इतनी लाचारी को
कौन जानता था क़ि..
आता हुआ दरिया जाता हुआ दरिया भी है
अब तो दांत गिर रहे है,
मसूड़े खली हो रहे है
मुह चिपट रहा है
आँखे धस रही है
वोह! पिता जी क्या आप ऐसे ही थे?
मै जवान हो गया, बलिष्ठं भी
तब भी लाचार ही
आपको देख रहा हू जर्जर होते हुए
वक्त के साथ तिनका सा बहते हुए
उफ़! आनंद! निकम्मे आनंद!
वक्त से लड़ने के लिए हाथ तो उठाते
एहसास होता क़ि तुम पित्रभक्त हो
कौन जानता था क़ि..
आता हुआ दरिया जाता हुआ दरिया भी है
तुम्हे पाता है आनंद? तुम कल भी लाचार होगे.
इतना ही... बिलकुल ऐसे ही.
पिता जी छोड़ देगें..
हमें, तुम्हे, दुनिया को, सबको.
जैसे दादा जी छोड़ कर गए थे
गम हो जायेगे अथाह आकाश में
साथ में बदन भी न होगा उनके
बिलकुल अकेले.. निश्तब्ध स्वर में
उड़ जायेगे कही
बचेगी तुम्हारी भीगी आँखे, लचर चेहरा
उनकी यादें, बलिष्ठ भुजाये, ऊचा कद
जो निराधार पड़ा होगा सामने
उफ़! आनंद, निकम्मे आनंद!
तुम लचर rahoge
कौन जानता था क़ि..
आता हुआ दरिया जाता हुआ दरिया भी है
मना रहा था मातम जमाना, साथ मिल जब हार का, तलास में नई राह की , मै उम्मीद लिए चलता रहा। सर्द थी वो रात मगर मै आग सा जलता रहा।
Wednesday, August 25, 2010
Sunday, August 22, 2010
मेरी ग़ज़ल : देखे सनम तुम्हे हम ऐसे ही हाल में
देखे सनम तुम्हे हम ऐसे ही हाल में.
भीगे से बदन में बिखरे से बाल में
देखे सनम तुम्हे हम ऐसे ही हाल में.
कोई झोका बह चला है फूलो की डाल में.
देखे सनम तुम्हे हम ऐसे ही हाल में.पहलू निशा में हो तुम फिर भी लगे नहीं क्यों?
अंशु निकल पड़े है मेरे इस सवाल में.
देखे सनम तुम्हे हम ऐसे ही हाल में.
तड़पन है कोई मन में आँखों में प्यास है,
फिर भी हसी बिखर गयी होठो से गल में
देखे सनम तुम्हे हम ऐसे ही हाल में.
मेरी ग़ज़ल:किसी शख्स ने तोडा मेरा गुरुर
किसी शख्स ने आके तोड़ा मेरे गुरूर देखो.
मिलने लगे घी आज कल,सबसे हुजूर देखो.
किसी शख्स ने आके तोड़ा मेरे गुरूर देखो.
पतझड़ में खिल उठी है कलिया ये प्यार की,
होठो पे है हसी अब, आँखों में नूर देखो.
किसी शख्स ने आके तोड़ा मेरे गुरूर देखो.
महबूब है दूर हमसे दिल में है बेकरारी,
इस तदपन में भी खुसी के, पाल ये जरूर देखो.
किसी शख्स ने आके तोड़ा मेरे गुरूर देखो.
हमको कहाँ पता था मुहब्बत की ये अदा है,
शोले चुभा के दिल में, खड़े है दूर देखो.
किसी शख्स ने आके तोड़ा मेरे गुरूर देखो.
मिलने लगे घी आज कल,सबसे हुजूर देखो.
किसी शख्स ने आके तोड़ा मेरे गुरूर देखो.
पतझड़ में खिल उठी है कलिया ये प्यार की,
होठो पे है हसी अब, आँखों में नूर देखो.
किसी शख्स ने आके तोड़ा मेरे गुरूर देखो.
महबूब है दूर हमसे दिल में है बेकरारी,
इस तदपन में भी खुसी के, पाल ये जरूर देखो.
किसी शख्स ने आके तोड़ा मेरे गुरूर देखो.
हमको कहाँ पता था मुहब्बत की ये अदा है,
शोले चुभा के दिल में, खड़े है दूर देखो.
किसी शख्स ने आके तोड़ा मेरे गुरूर देखो.
Wednesday, July 28, 2010
उफ़! कितना हैरान हू मै.
उफ़! कितना हैरान हू मै.... अपने आप से. अपने प्यार से, अपनी वफ़ा से.
दिमाग कितनी बार उकसाता है मुझे उस वेवफा को गली देने के लिए, मगर दिल..... मुझे हर बार एहसास दिलाता है -कि कम्बक्त! वह प्यार है तुम्हारा, आज किसी और की हो गयी तो क्या हुआ? क्या था जो तुमसे छीन कर ले गयी. कुछ नहीं... कुछ भी नहीं... उसने बस तुम्हे दिया ही दिया है... कभी न ख़त्म होने वाली यादें. अगर जी सकते हो और जीने का तरीका मालूम है तो काफी है वो जीने के लिए.
क्यों खफा होते हो जब वह किसी और का जिक्र करती है? ये क्यों नहीं सोचते तुम उससे पहले हो जिसका वो जिक्र करती है.... खुद को ये क्यों यकीं नहीं दिलाते कि तुम्हारा कद उससे बड़ा है जिससे वो तुम्हारी तुलना करती है. मुझे नहीं लगता कि हर वह शख्स तुम्हे पसंद या फिर प्यार करे जिसे तुम करते हो तब ये उम्मीद उससे क्यों?
तुम उसे प्यार करते हो ये तुम्हारी अपनी भावना है. वह तुम्हे बीच रास्ते में छोड़ कर किसी और को अपना लिया ये उसकी फितरत है, तो तुम इस लिए क्यों परेशां होते हो कि वह किसी और की हो गयी जब कि उसे परवाह तक नहीं कि तुम गैर हो गए.
अगर समझ सकते हो तो कुछ इस तरह से समझो कि तुम्हे अपने बेटे के भविष्य पर इन्वेस्टमेंट करना है वह भले ही तुम्हारे बुढ़ापे के बारे में न सोचे. हां ऊम्मीद करना लाज़मी है मगर उस पर आंसू बहाना नासमझी है.
हम उसके थे... है... और रहेगे इस बात के लिए प्रयत्न करना तुम्हारी वफ़ा को साबित करती मगर उससे वफ़ा कि उम्मीद करना तुम्हारी खुदगर्जी है.
उफ़! कितनी बड़ी- बड़ी बातें करता है न दिल! काश इसे पता होता कि कितनी तकलीफ होती है जब कोई इस तरह वेवफाई करता है. वह शख्स जिसने आपको जिन्दगी के तमाम सपने दिखाए हो और फिर वही उनका क़त्ल कर दे. उफ़! फिर कितनी देर लगेगी उसका क़त्ल करने में अगर कर पाते तो.
उफ़ कितना हैरान हू मै?
दिमाग कितनी बार उकसाता है मुझे उस वेवफा को गली देने के लिए, मगर दिल..... मुझे हर बार एहसास दिलाता है -कि कम्बक्त! वह प्यार है तुम्हारा, आज किसी और की हो गयी तो क्या हुआ? क्या था जो तुमसे छीन कर ले गयी. कुछ नहीं... कुछ भी नहीं... उसने बस तुम्हे दिया ही दिया है... कभी न ख़त्म होने वाली यादें. अगर जी सकते हो और जीने का तरीका मालूम है तो काफी है वो जीने के लिए.
क्यों खफा होते हो जब वह किसी और का जिक्र करती है? ये क्यों नहीं सोचते तुम उससे पहले हो जिसका वो जिक्र करती है.... खुद को ये क्यों यकीं नहीं दिलाते कि तुम्हारा कद उससे बड़ा है जिससे वो तुम्हारी तुलना करती है. मुझे नहीं लगता कि हर वह शख्स तुम्हे पसंद या फिर प्यार करे जिसे तुम करते हो तब ये उम्मीद उससे क्यों?
तुम उसे प्यार करते हो ये तुम्हारी अपनी भावना है. वह तुम्हे बीच रास्ते में छोड़ कर किसी और को अपना लिया ये उसकी फितरत है, तो तुम इस लिए क्यों परेशां होते हो कि वह किसी और की हो गयी जब कि उसे परवाह तक नहीं कि तुम गैर हो गए.
अगर समझ सकते हो तो कुछ इस तरह से समझो कि तुम्हे अपने बेटे के भविष्य पर इन्वेस्टमेंट करना है वह भले ही तुम्हारे बुढ़ापे के बारे में न सोचे. हां ऊम्मीद करना लाज़मी है मगर उस पर आंसू बहाना नासमझी है.
हम उसके थे... है... और रहेगे इस बात के लिए प्रयत्न करना तुम्हारी वफ़ा को साबित करती मगर उससे वफ़ा कि उम्मीद करना तुम्हारी खुदगर्जी है.
उफ़! कितनी बड़ी- बड़ी बातें करता है न दिल! काश इसे पता होता कि कितनी तकलीफ होती है जब कोई इस तरह वेवफाई करता है. वह शख्स जिसने आपको जिन्दगी के तमाम सपने दिखाए हो और फिर वही उनका क़त्ल कर दे. उफ़! फिर कितनी देर लगेगी उसका क़त्ल करने में अगर कर पाते तो.
उफ़ कितना हैरान हू मै?
Wednesday, July 14, 2010
प्यार, इश्क और मुहब्बत
उफ़! प्यार, इश्क और मुहब्बत!!!
मोतीचूर के अंदर भरे हुए ऐसे जहर की तरह है जिसको खाने की इच्छा, मौत और उससे होने वाली तकलीफ के अहसास को भी पीछे छोड़ देती है.
दो अजनवी इंसानों का आमना सामना... दिलो की खनखनाहट और आँखों में इशारों का ताना -बाना एक स्वस्थ इन्सान को एक ऐसी बीमारी से ग्रसित कर देते है कि जिसका दर्द भी दुनिया की तमाम खुसिओ पर भरी पड़ता है. न अपनों की फ़िक्र न खुद की खबर, अपनों के अरमान जलते है तो जलने दो... खुद को मौत आती है तो आने दो मगर वह.....
"उफ़! डूब जाये समुन्दर में सारा जहाँ भी तो गम नहीं,
बस एक पतवार हो दरिया में मेरे महबूब के लिए"
क्या रखा है उसकी पलकों में जिसके उठने का इंतजार वक्त को थाम लेता है?
क्या रखा है उसकी आँखों में जिसकी एक नज़र बदन के हर तार को छेड़ देती है?
क्या रखा है उसकी मुस्कान पर जिस पर दिल का कतरा - कतरा कुर्बान हो जता है?
घर की तीसरी मंजिल पर बीमार पड़ी माँ की आवाज भी अनसुनी कर दी जाती है जब बीच की दो सीढियों में फैले हुए हुए अँधेरे की कल्पना की जाती है तो फिर ऐसा क्या है महबूब के पहलु में जिसके लिए दो सीढिया क्या, दो जंगल भी पार करने में खौफ नहीं.
हैरानी होती है जब इस बात पर जिक्र किया जाता है....
हैरानी होती है जब इस बात पर सवाल किया जाते है...
मगर हैरानी की हद तब होती है जब हर जिक्र अर्थहीन और हर सवाल बे-जवाब होता है...
उससे मिलने की तमन्ना हर तमन्ना को बेनकाब कर देती है उसे पाने की चाहत हर चाहत तो कमजोर कर देती है, जिन्दगी के सफ़र में जब पीछे मुड कर देखते है तो मुस्किल ही कुछ बचता है इस दुनिया में महबूब के शिवाय,
मोतीचूर के अंदर भरे हुए ऐसे जहर की तरह है जिसको खाने की इच्छा, मौत और उससे होने वाली तकलीफ के अहसास को भी पीछे छोड़ देती है.
दो अजनवी इंसानों का आमना सामना... दिलो की खनखनाहट और आँखों में इशारों का ताना -बाना एक स्वस्थ इन्सान को एक ऐसी बीमारी से ग्रसित कर देते है कि जिसका दर्द भी दुनिया की तमाम खुसिओ पर भरी पड़ता है. न अपनों की फ़िक्र न खुद की खबर, अपनों के अरमान जलते है तो जलने दो... खुद को मौत आती है तो आने दो मगर वह.....
"उफ़! डूब जाये समुन्दर में सारा जहाँ भी तो गम नहीं,
बस एक पतवार हो दरिया में मेरे महबूब के लिए"
क्या रखा है उसकी पलकों में जिसके उठने का इंतजार वक्त को थाम लेता है?
क्या रखा है उसकी आँखों में जिसकी एक नज़र बदन के हर तार को छेड़ देती है?
क्या रखा है उसकी मुस्कान पर जिस पर दिल का कतरा - कतरा कुर्बान हो जता है?
घर की तीसरी मंजिल पर बीमार पड़ी माँ की आवाज भी अनसुनी कर दी जाती है जब बीच की दो सीढियों में फैले हुए हुए अँधेरे की कल्पना की जाती है तो फिर ऐसा क्या है महबूब के पहलु में जिसके लिए दो सीढिया क्या, दो जंगल भी पार करने में खौफ नहीं.
हैरानी होती है जब इस बात पर जिक्र किया जाता है....
हैरानी होती है जब इस बात पर सवाल किया जाते है...
मगर हैरानी की हद तब होती है जब हर जिक्र अर्थहीन और हर सवाल बे-जवाब होता है...
उससे मिलने की तमन्ना हर तमन्ना को बेनकाब कर देती है उसे पाने की चाहत हर चाहत तो कमजोर कर देती है, जिन्दगी के सफ़र में जब पीछे मुड कर देखते है तो मुस्किल ही कुछ बचता है इस दुनिया में महबूब के शिवाय,
Tuesday, July 13, 2010
वेवफा तेरी याद आ गयी.
वेवफा तेरी याद आ गयी.
तू न आई, तेरी वफ़ा न आई,
वेवफा तेरी याद आ गयी.
तूने न अपनी खबर भेजी, न हमने खबर लेने की कोशिश की.
तुम्हारे पास साथ था
तुम्हारे तीसरे चौथे या पाचवें प्रेमी या होने वाले पति का
और मेरे पास मेरा अथाह सूनापन, मेरे आंसू और मेरा काम.
कितने दिन गुज़र गए यू ही तेरी यादो से दूर रह कर.
न जाने आज की ये कैसी सुबह थी,
हवाए शायद अपना रुख बदल बैठी
तेरे शहर की ओर से मेरे शहर की ओर चलने लगी.
ओ भी बेहद नम....
उनमे नमी थी तेरी यादों की.
मै हर रोज की तरह ही आज भी निकला था
बेख़ौफ़... बेपरवाह... खुले आसमान के नीचे.
उफ़! पूरा बदन भीग गया, वेवफा तेरी यादों की नमी से...
फिर सूरज भी निकला, धूप भी खिली
मगर फिर भी न सूख पाई मेरी आँखों की नमी.
तेरे पास साथ भी है, हमराह भी है
साथी भी है हमसफ़र भी है,
उफ़! तेरी किस्मत!!!
एक को छोड़ा दूसरा मिला,
दुसरे को छोड़ा तीसरा मिला,
तीसरे को छोड़ा तो चौथा मिला....
और तेरी किस्मत पे हैरानी तब और भी होती है
जब सोचता हू तेरी मासूमियत के बारे में....
तेरी शख्शियत के बारे में.....
हर शख्स मर मिटा तेरी मासूमियत पे
मगर तेरी मासूमियत और तेरी शख्शियत की दीवार आज भी उतनी ही गौरवपूर्ण है
जितनी शुरुवात में थी.
मज़बूत चट्टाने भी धीरे धीरे कर के टूट जाती,
तू न आई, तेरी वफ़ा न आई,
वेवफा तेरी याद आ गयी.
तूने न अपनी खबर भेजी, न हमने खबर लेने की कोशिश की.
तुम्हारे पास साथ था
तुम्हारे तीसरे चौथे या पाचवें प्रेमी या होने वाले पति का
और मेरे पास मेरा अथाह सूनापन, मेरे आंसू और मेरा काम.
कितने दिन गुज़र गए यू ही तेरी यादो से दूर रह कर.
न जाने आज की ये कैसी सुबह थी,
हवाए शायद अपना रुख बदल बैठी
तेरे शहर की ओर से मेरे शहर की ओर चलने लगी.
ओ भी बेहद नम....
उनमे नमी थी तेरी यादों की.
मै हर रोज की तरह ही आज भी निकला था
बेख़ौफ़... बेपरवाह... खुले आसमान के नीचे.
उफ़! पूरा बदन भीग गया, वेवफा तेरी यादों की नमी से...
फिर सूरज भी निकला, धूप भी खिली
मगर फिर भी न सूख पाई मेरी आँखों की नमी.
तेरे पास साथ भी है, हमराह भी है
साथी भी है हमसफ़र भी है,
उफ़! तेरी किस्मत!!!
एक को छोड़ा दूसरा मिला,
दुसरे को छोड़ा तीसरा मिला,
तीसरे को छोड़ा तो चौथा मिला....
और तेरी किस्मत पे हैरानी तब और भी होती है
जब सोचता हू तेरी मासूमियत के बारे में....
तेरी शख्शियत के बारे में.....
हर शख्स मर मिटा तेरी मासूमियत पे
मगर तेरी मासूमियत और तेरी शख्शियत की दीवार आज भी उतनी ही गौरवपूर्ण है
जितनी शुरुवात में थी.
मज़बूत चट्टाने भी धीरे धीरे कर के टूट जाती,
मगर तेरी शख्शियत.... ओ नहीं टूटने वाली.
काश कभी कोई तुझे भी छोड़ा होता.
कोई दर्द मिला होता तुझे भी मेरी तरह
कोई वेवफाई करता तुझसे तेरी तरह
तुझे क्यों नहीं छोड़ा कभी किसी ने ?
एक हैरानी भरा सवाल है मेरे लिए?
क्या है तुझमे तेरी आवाज के शिवाय?
न हुश्न... न चेहरा... न कद....
ये मुश्किल ही पता चलता की शुरुवात कहा से है और अंत कहाँ? मगर फिर भी... उफ़! दीवानों के दिल क्यों दफ़न होना चाहते हो ऐसी जालिमों के पीछे....
अब छोडो भी उसे,
क्यों बढ़ाते हो ऐसे बेगैरत, बदसूरत इंसानों के हौसले.
क्यों आमंत्रित करते हो उन्हें एक और दिल का क़त्ल करने के लिए.
काश एक बार तुम्हे भी छोड़ता कोई....
तुम ऐसे ही अकेले हो जाते जैसे की मै,
मै जानता हू तुम उस हाथ से उस ईट को तोड़ने में माहिर हो
जिस ईट से दूसरे हाथ लहूलुहान हो जाते है,
तुम उस खतरे से भी खतरनाक हो
जिस खतरे के दूसरे शिकार हो जाते है...
अब इतना कुछ तुम्हारे बारे में जानते हुए मै तुमसे क्या शिकायत करू...
तुमने उसे नहीं चुना जो तुम्हारी जिन्दगी में पहला प्यार बन कर आया था
तो भला मै क्या हू? दूसरा... तीसरा.... क्या हू मै?
आज उसे नाज़ है तुमपे जो तुम्हे जिन्दगी भर के लिए पाने वाला है...
और हो भी क्यों न... ?
तुम हो ही ऐसी,
कोई भी तुमपे नाज करेगा....
मैंने भी किया था...
टूट कर किया था... सीना उठा कर किया था
ये बात और है की आज गर्दन झुक जाती है उनके सामने
जिनसे कभी चिल्ला चिल्ला कर तेरी वफ़ा का सबूत दिया था....
क्यों दिया था मालूम नहीं....
मगर कल्पना में जब भी कल्पना की कल्पना करता,
कल्पना ख़ूबसूरत ही होती...
और इतनी खूबसूरत
जिसके लिए हद से भी ज्यादा खूबसूरत लड़की को नज़र अंदाज किया जा सकता था.
मैंने भी किया और बहुतो को किया.
और उफ़!!!!!!!शायद उन्होंने भी तुम पर कम नाज न किया होगा
जो तुम्हारी जिन्दगी में मुझसे पहले आ चुके थे.
फ़ोन पे किसी की शक्ल थोड़े दिखती है
और जो सुनाई देती है उसमे तुम्हारा कोई जवाब नहीं....
कोई भी दीवाना हो जायेगा तुम्हारी आवाज सुन कर...
और तुमने अपनी इस मजबूत आधार का बखूबी इस्तेमाल किया.
और बात जब जब भी असल मुद्दे तक पहुचती
तब तक जिन्दगी की नाव नदी का आधा हिस्सा पार कर चुकी होती है...
अब जाये तो किधर?
न लौट सकता है...
और न बढ़ सकते है....
बस यू ही देखते रहे मजधार में जिन्दगी को डूबते हुए
ओह बेवफा तेरी याद आ गयी...
Thursday, July 1, 2010
वेवफा! आखिर जीत तो तेरी ही हुई
वेवफा! आखिर जीत तो तेरी ही हुई.

हम न मिल सके ये भी तुम्हारी मजबूरी थी, दूसरे का दामन थामना पड़ा ये भी तुम्हारी मजबूरी थी और दोनों ही मजबूरी तुम्हारी ही तरफदारी करती है. एक मजबूरी में पापा तुम्हरे खिलाफ थे और दूसरी मजबूरी में साथ थे.
हम न तो तब मजबूर थे की तुमसे शादी न करे और न हीं अब मजबूर है की किसी और से शादी कर ले.
तुम मजबूरी- मजबूरी में अपना घर बसा बैठे और अपनी आज़ादी में अपना घर जला बैठे.
तुम मजबूरी के चलते ही सही किसी और को अपना बैठे और हम अपनी आज़ादी के चलते किसी और के न हो सके.
कुछ वक्त गुज़रा तो तुम्हारी मजबूरी तुम्हे प्यारी लगती चली गयी और मेरी मजबूरी मेरी बर्बादी का सबब बन गयी. तुम मजबूर हो कर भी सब कुछ पा लिया और हम आजाद हो कर सब कुछ खो बैठे.
वेवफा! आखिर तू हार कर भी जीत गयी.

हम न मिल सके ये भी तुम्हारी मजबूरी थी, दूसरे का दामन थामना पड़ा ये भी तुम्हारी मजबूरी थी और दोनों ही मजबूरी तुम्हारी ही तरफदारी करती है. एक मजबूरी में पापा तुम्हरे खिलाफ थे और दूसरी मजबूरी में साथ थे.
हम न तो तब मजबूर थे की तुमसे शादी न करे और न हीं अब मजबूर है की किसी और से शादी कर ले.
तुम मजबूरी- मजबूरी में अपना घर बसा बैठे और अपनी आज़ादी में अपना घर जला बैठे.
तुम मजबूरी के चलते ही सही किसी और को अपना बैठे और हम अपनी आज़ादी के चलते किसी और के न हो सके.
कुछ वक्त गुज़रा तो तुम्हारी मजबूरी तुम्हे प्यारी लगती चली गयी और मेरी मजबूरी मेरी बर्बादी का सबब बन गयी. तुम मजबूर हो कर भी सब कुछ पा लिया और हम आजाद हो कर सब कुछ खो बैठे.
वेवफा! आखिर तू हार कर भी जीत गयी.
Saturday, June 26, 2010
Dont waist your time in love....
क्या है ये प्यार की कहानी...?
जब पहली - पहली बार वह मेरी ओर आकर्षित हुई थी . मै जानता था की ये बस उम्र की फितरत है, जो कालेज की प्रार्थना स्थल पर हर रोज या फिर अक्सर अद्यापको द्वारा मेरी काबिलियत की तारीफ पर मेरी शख्सियत की ओर खिचती चली आ रही थी. मेरी ओ ढेर साडी पेंटिंग्स या फिर इर्द गिर्द पड़ी मगज़िनेस पर छोई मेरी छोटी - मोटी कहानिया या फिर लेख पर गदगद हो कर मेरी काल्पनिक तश्बीर को अपने दिल के किसी कोने में सजाने की कोशिश कर रही है. मै जानता था ये प्यार नहीं है.....उम्र १६-१७ की रही होगी, और शायद ये प्यार की उम्र नहीं होती.
उस समय मोबाईल का उतना चलन भी न था, काफी काम लोगो की जेब में हुआ करता, हां मै खुशनशीब था और शायद वह भी. हम दोनों के पास था. नयी - नयी गाड़ी पर खा-म-खा कपडा मरने को दिल कर ही जाता है धुल का होना उनता जरूरी नहीं होता.
अक्सर उसकी मिस कॉल होती जवाब में मेरी २ मिनट की कॉल, पैसे भी काम होते मगर उतनी सी आवाज काफी हुआ करती दिल की उथल पुथल के लिए. बात बढ़ी, नजदीकिय बढ़ी, मगर दिल में अब भी यकीं था की ये प्यार नहीं है. हद तो तब हुई जब करीबियों का सिलसिला तेज हुआ, हसरतें बढ़ी और इजहार हुआ.---- ३ शब्द! आई लव यू..... यकीं तो अब भी था की ये प्यार नहीं है.
वक्त गुजरने के साथ बातो में दिलचस्पी बनी रहे सो बातो में हमने सपनो का जिक्र जरूरी समझा जाता है और हमने भी जरूरी समझा. बातें आगे बढ़ी, बातें आगे बढ़ी दिलों के कोनो से निकल कर पूरे दिलों में फैलना शुरू हो गयी. बातो में सपनो के सिलसिलों ने जिन्दगी के दुसरो पड़ाव में दखलंदाजी शुरू कर दी.
शादी ! जिन्दगी का एक अहम फैसला ! बात थमी नहीं और यहाँ तक आ पहुची. मगर यकीं अब भी वही था कि ये प्यार नहीं है.
हसरतें अपने पांव फैलाती रही, लम्बी रातों में लम्बी बैटन के सिलसिलें बनते चले गए. वह पूछती हम शादी कब करेगे और उत्तर में मै मुस्कुरा पड़ता- अजी कर लेगे वैसे भी अभी उम्र ही क्या है? उसका संदेह तडप उठता... उफ़! अगर शादी नहीं हुए तो ? मै हसने से नहीं चुकता - अजी ऐसे कैसे हो सकता है.... शादी होगी और जरूर होगी! मेरे होठो पे अगला शब्द होता मगर धडकनों को इसकी कोई परवाह न होती इन बातो से. होगी तो हो ही जाएगी न हुई तो न सही. क्यों कि मै जानता था कि ये प्यार नहीं है.
हदें और सरहदें थमी नहीं शादी को अभी लम्बा वक्त था कि अपने ख्वाबो के महल कि बातें शुरू होगई. उन पर भी जी नहीं भरा तो बच्चो कि बातें शुरू हुई. उनके नामों कि परिकल्पनाए हवा में उड़ान भरने लगी. उसका दिल रखने के लिए सब कुछ स्वावीकर करता हाँ ऐसे भी होगा.... वैसे भी होगा.... हम ये भी करेंगे ....हम ओ भी करेंगे.
फिर सपनो का खिचाव इतना बढ़ा कि उनके टूटने का डर सताने लगा. अब जब भी दूर होने या फिर जुदा होने कि बातें होती तो दिल उतना बेपरवाह न था. मगर यकीं तब भी था कि उसे उतना दर्द न होगा अगर उसके साथी कि शादी कही और होती है
जिन्दगी के ये हसीं लम्हे थे जो साथ- साथ गुजर गए-कुछ हसरतों के साथ...... कुछ ख्वाबो के साथ... न कभी मै समझ सका और नहीं शायद वह. बस बहते गए फिर दरिया कब आ गया पाता ही नहीं चला. मेरा वेपर्वाह्पन अब उतना मजबूत नहीं था, अब बातो से भी जी न भरता करीब आने को जी करता. मौका न मिलने पर शादी कि गुन्जाईस शुरू हुई. मेरा यकीं टूटने लगा. ऐसा कुछ था जो मुझे डराना शुरू कर दिया - क्या होगा अगर ओ किसी और कि हो गयी? मै अपना पक्ष मजबूत करना शुरू कर दिया क्यों कि मुझे अंदाजा था कि इस जंग में मेरी मुश्किलें कहाँ तक बढ़ सकती हैं. मतलब मै शादी के लिए तैयार था और वह?
उफ़! मै उसे वेवफा कैसे कहू? पूरे चार साल के रिश्ते पर पर्दें ड़ाल कर उसने सगाई कर ली .... अकेले बगैर मेरे. तब एक और मेरी ही तरह मासूम उसकी जिन्दगी का हिस्सा बन कर मेरे और उसके बीच कि दीवाल में तब्दील हो गया. मैंने सवाल किया तो उसने भी टपक से जवाब दे दिया - मेरी किस्मत में शायद आप नहीं थे.....और ओ सपने जो हमने साथ देखे थे वो? वो कसमे जो साथ खायी थी वो? वो वडा जो तुमने मुझसे किया था वो? वो अरमा जो मैंने तुम्हारे लिए किये थे वो? उसने फिर आगे कुछ नहीं किया शिवाय एक शब्द के -" हम मजबूर थे."
मेरी सांसे अटक गयी... दिल टूट गया... भरोसा उठ गया....
उस दी पहली बार गहराई से सोचा प्यार के बारे में..... जवाब में मिला......
किसी से दुश्मनी निकलने का सबसे अच्छा हथियार है प्यार
किसी बेगैरत के लिए टाइम पास का बेहतर जरिया है प्यार
किसी को बर्बाद करने का सबसे असं रास्ता है प्यार
कुछ इंसानों के लिए ek fashion है प्यार
so dont waist टाइम in love.... just focus in your carier
प्यार to paglo ki tarah apke peechhe aayega.
जब पहली - पहली बार वह मेरी ओर आकर्षित हुई थी . मै जानता था की ये बस उम्र की फितरत है, जो कालेज की प्रार्थना स्थल पर हर रोज या फिर अक्सर अद्यापको द्वारा मेरी काबिलियत की तारीफ पर मेरी शख्सियत की ओर खिचती चली आ रही थी. मेरी ओ ढेर साडी पेंटिंग्स या फिर इर्द गिर्द पड़ी मगज़िनेस पर छोई मेरी छोटी - मोटी कहानिया या फिर लेख पर गदगद हो कर मेरी काल्पनिक तश्बीर को अपने दिल के किसी कोने में सजाने की कोशिश कर रही है. मै जानता था ये प्यार नहीं है.....उम्र १६-१७ की रही होगी, और शायद ये प्यार की उम्र नहीं होती.
उस समय मोबाईल का उतना चलन भी न था, काफी काम लोगो की जेब में हुआ करता, हां मै खुशनशीब था और शायद वह भी. हम दोनों के पास था. नयी - नयी गाड़ी पर खा-म-खा कपडा मरने को दिल कर ही जाता है धुल का होना उनता जरूरी नहीं होता.
अक्सर उसकी मिस कॉल होती जवाब में मेरी २ मिनट की कॉल, पैसे भी काम होते मगर उतनी सी आवाज काफी हुआ करती दिल की उथल पुथल के लिए. बात बढ़ी, नजदीकिय बढ़ी, मगर दिल में अब भी यकीं था की ये प्यार नहीं है. हद तो तब हुई जब करीबियों का सिलसिला तेज हुआ, हसरतें बढ़ी और इजहार हुआ.---- ३ शब्द! आई लव यू..... यकीं तो अब भी था की ये प्यार नहीं है.
वक्त गुजरने के साथ बातो में दिलचस्पी बनी रहे सो बातो में हमने सपनो का जिक्र जरूरी समझा जाता है और हमने भी जरूरी समझा. बातें आगे बढ़ी, बातें आगे बढ़ी दिलों के कोनो से निकल कर पूरे दिलों में फैलना शुरू हो गयी. बातो में सपनो के सिलसिलों ने जिन्दगी के दुसरो पड़ाव में दखलंदाजी शुरू कर दी.
शादी ! जिन्दगी का एक अहम फैसला ! बात थमी नहीं और यहाँ तक आ पहुची. मगर यकीं अब भी वही था कि ये प्यार नहीं है.
हसरतें अपने पांव फैलाती रही, लम्बी रातों में लम्बी बैटन के सिलसिलें बनते चले गए. वह पूछती हम शादी कब करेगे और उत्तर में मै मुस्कुरा पड़ता- अजी कर लेगे वैसे भी अभी उम्र ही क्या है? उसका संदेह तडप उठता... उफ़! अगर शादी नहीं हुए तो ? मै हसने से नहीं चुकता - अजी ऐसे कैसे हो सकता है.... शादी होगी और जरूर होगी! मेरे होठो पे अगला शब्द होता मगर धडकनों को इसकी कोई परवाह न होती इन बातो से. होगी तो हो ही जाएगी न हुई तो न सही. क्यों कि मै जानता था कि ये प्यार नहीं है.
हदें और सरहदें थमी नहीं शादी को अभी लम्बा वक्त था कि अपने ख्वाबो के महल कि बातें शुरू होगई. उन पर भी जी नहीं भरा तो बच्चो कि बातें शुरू हुई. उनके नामों कि परिकल्पनाए हवा में उड़ान भरने लगी. उसका दिल रखने के लिए सब कुछ स्वावीकर करता हाँ ऐसे भी होगा.... वैसे भी होगा.... हम ये भी करेंगे ....हम ओ भी करेंगे.
फिर सपनो का खिचाव इतना बढ़ा कि उनके टूटने का डर सताने लगा. अब जब भी दूर होने या फिर जुदा होने कि बातें होती तो दिल उतना बेपरवाह न था. मगर यकीं तब भी था कि उसे उतना दर्द न होगा अगर उसके साथी कि शादी कही और होती है
जिन्दगी के ये हसीं लम्हे थे जो साथ- साथ गुजर गए-कुछ हसरतों के साथ...... कुछ ख्वाबो के साथ... न कभी मै समझ सका और नहीं शायद वह. बस बहते गए फिर दरिया कब आ गया पाता ही नहीं चला. मेरा वेपर्वाह्पन अब उतना मजबूत नहीं था, अब बातो से भी जी न भरता करीब आने को जी करता. मौका न मिलने पर शादी कि गुन्जाईस शुरू हुई. मेरा यकीं टूटने लगा. ऐसा कुछ था जो मुझे डराना शुरू कर दिया - क्या होगा अगर ओ किसी और कि हो गयी? मै अपना पक्ष मजबूत करना शुरू कर दिया क्यों कि मुझे अंदाजा था कि इस जंग में मेरी मुश्किलें कहाँ तक बढ़ सकती हैं. मतलब मै शादी के लिए तैयार था और वह?
उफ़! मै उसे वेवफा कैसे कहू? पूरे चार साल के रिश्ते पर पर्दें ड़ाल कर उसने सगाई कर ली .... अकेले बगैर मेरे. तब एक और मेरी ही तरह मासूम उसकी जिन्दगी का हिस्सा बन कर मेरे और उसके बीच कि दीवाल में तब्दील हो गया. मैंने सवाल किया तो उसने भी टपक से जवाब दे दिया - मेरी किस्मत में शायद आप नहीं थे.....और ओ सपने जो हमने साथ देखे थे वो? वो कसमे जो साथ खायी थी वो? वो वडा जो तुमने मुझसे किया था वो? वो अरमा जो मैंने तुम्हारे लिए किये थे वो? उसने फिर आगे कुछ नहीं किया शिवाय एक शब्द के -" हम मजबूर थे."
मेरी सांसे अटक गयी... दिल टूट गया... भरोसा उठ गया....
उस दी पहली बार गहराई से सोचा प्यार के बारे में..... जवाब में मिला......
किसी से दुश्मनी निकलने का सबसे अच्छा हथियार है प्यार
किसी बेगैरत के लिए टाइम पास का बेहतर जरिया है प्यार
किसी को बर्बाद करने का सबसे असं रास्ता है प्यार
कुछ इंसानों के लिए ek fashion है प्यार
so dont waist टाइम in love.... just focus in your carier
प्यार to paglo ki tarah apke peechhe aayega.
Thursday, June 24, 2010
एक वेवफा क्यों नहीं कर सकती वफ़ा?
एक वेवफा क्यों नहीं कर सकती वफ़ा? सोचने को तो कुछ भी सोचा जा सकता है मगर कारण सिर्फ एक है - बाप की खुदगर्जी! जी हाँ, मै यकीं से इस बात को कह सकता हू. और साबित भी कर सकता हू.
एक बाप जो अपनी बेटी को जी जान से प्यार करता है, उसके लिए दुनिया की हर खुसी ला कर उसके कदमो में डाल सकता है और उसे इस बात का भी बखूबी अंदाजा है की उसकी बेटी उसके इस प्यार को अच्छी तरह समझती है और वह भी उसे उतना ही प्यार करती है, उसके साथ उसे रहना पसंद है, हर रात सोने से पहले उसे अपने प्यारे पापा से बात करना पसंद है, अगर उसके प्यारे पापा अपने किसी काम से २ दिन के लिए ही सही बाहर जाते है और उन्हें अचानक बेटी की याद सताती और उसे फ़ोन कर बैठे, तो बेटी की आवाज से साफ पता चलता है की उसे इसी फ़ोन का तो बेसब्री से इंतजार था, आज ये भी पक्का था कि अगर पापा से बात न होती तो उसे नीद नहीं आने वाली थी,
घर में हर सुबह शाम बेटी एक अच्छी बहू की तरह पापा का ख्याल रखती है,
उन्हें चाय कब चाहिए?
कौन सी चीजो से उन्हें परहेज है?
किस दवा को उन्हें कब लेनी है?
अभी उन्हें खाना मिला या नहीं?
क्या -क्या उन्हें पसंद है और क्या नहीं? वगैरा - वगैरा.
फिर जरा रुक कर कल्पना कीजिये..... अचानक बेटी के जिन्दगी में एक अपरचित, अजनवी अंजाना शख्स आता है और बेटी के सारे प्यार का अकेला वारिश बन जाता है. अगर वह शख्स नालायक हुआ तो बाप ने बेटी को प्यार से समझा दिया कि वह ब्यक्ति उसके लायक नहीं है, बेटी को समझ में आ गया तो ठीक है वर्ना जोर जबरजस्ती भी जायज है, आखिर बेटी कि जिन्दगी का सवाल है और यदि लायक हुआ तो रोक टोक कि उतनी गुन्जाईस नहीं होती है. एक बुजुर्ग और बेटी के पापा होने के नाते उन्हें पूरा अंदाजा है कि एक न एक दिन तो कोई आएगा उसकी जिन्दगी में.
लेकिन...... कहानी अभी बाकी है मेरे दोस्त!!!!!!!!
एक दिन अचानक प्यारे पापा को अहसास हुआ कि उनकी अपनी बेटी उनके हाथ से जा चुकी है. आज उनकी दवा सिर्फ इसलिए लेट हुई क्योकि उस समय उन अजनवी महोदय का फ़ोन आया हुआ था जिससे बात करने कि खुसी में बेटी को पापा कि दवा का भी ख्याल नहीं रहा, या फिर शायद बात ये भी ही सकती है कि आज कल बेटी में सोने पहले उनसे बात करने कि आदत न रही हो, क्योंकि रात का एक हिस्सा तो उस अजनवी से बात करने में निकल जाती है, और सुबह बेटी इस उम्मीद में बिस्तर से देर में उठती है कि शायद अभी अभी उसका हमनशी, हमसफ़र हमदर्द नीद से जगा होगा और उसकी अगड़ाई भरती हुई एक मीठी सी आवाज सुनने को मिल जाये और इसी चक्कर में पापा कि चाय फिर लेट हो गयी.
अब तक पापा को शायद इस बात का गम भी सताने लगा था कि एक बेटी जिस पर उन्होंने अपनी हर खुसी लुटा कर उसे पाला, और आज उसकी जिन्दगी में किसी और शख्स कि इतनी अहमियत कैसे हो सकती है. वह सिर्फ उससे बात करने कि खुसी में पापा कि दवा कैसे भूल सकती है,
बाहर से २ दिन बाद लौटने पर जो बेटी दरवाजे पर उनका इंतजार करती हुई मिला करती थी वह अब क्यों याद नहीं रखती कि उसके पापा आज घर लौटने वाले है.
उनकी अपनी बेटी उनके कीमती तोहफों को उतना सहेज कर क्यों नहीं रखती जितना कि उस अजनवी शख्स द्वारा दिए हुए एक मामूली से रुमाल को संभाल कर रखती है.
एक बाप कि खुदगर्जी उसके अन्दर एक वाइरस कि तरह फ़ैलाने लगती है, उसे अब दुनिया कि हर हकीकत एक गुनाह कि तरह दिखती है, उसे इस बात को स्वीकार करने में मुस्किल होना शुरू हो जाती है कि उसकी अपनी बेटी भी एक वैसी ही बेटी है जैसे कि २० साल पहले वह भी किसी के बाप से उसकी बेटी को छीन कर लाया था और बदनशीबी से आज वह उसकी पत्नी है. जिससे वह ये कभी उम्मीद नहीं करता कि वह अपने बाप को अपने पति यानि उससे ज्यादा प्यार करे.
कितनी हैरानी कि बात है कि आज वह खुद इतनी सी बात समझ नहीं पा रहा है कि उसकी बेटी ऐसा कुछ भी नहीं कर रही है जो उसे नहीं करना चाहिए था. उसका पागलपन यही पर रुका नहीं और उसने अपनी ही बेटी के भविष्य के ख्वाबो को सिर्फ अपनी खुदगर्जी में इस कदर रौद डाला कि वह चाह कर भी अपने ख्वाबो के टुकडो समेट न सके.
दोस्तों! उसके पागलपन की हद यहाँ पर थमती नहीं... वह बेटी के भविष्य की दुहाई देकर उसकी शादी कही और करता है कि शायद अब उसकी बेटी उसकी बन कर रहेगी और उसके खुबसूरत शब्दों का जाल कुछ यूँ होता है- कि वह जो कुछ भी कर रहा है अपनी बेटी की ख़ुशी के लिए कर रहा है. उसकी बेटी उस दूसरे इन्सान के साथ ज्यादा खुश रहेगी.
दोस्तों! क्या आप उसकी इस बात पर इतनी आसानी से यकीं कर लोगे? मुझे तो नहीं लगता की आप इतने भी मुर्ख हो सकते हो.
कारण १. जब उसने शुरू में अपनी बेटी को उस अजनवी शख्स की तरफ झुकते हुए देखा तो रोका क्यों नहीं? उसकी सबसे बड़ी गलती...
कारण २. क्या उसे इस बात का अहसास नहीं है की उसकी बेटी का अतीत उसका पीछा नहीं छोड़ने वाला.... मुझे लगता है कि एक सही गलत की पहचान रखने वाले बुद्धिमान बाप को इस बात को समझाने की जरुरत होनी चाहिए
कारण ३. अगर उसे खुद को इस बात का पता चल जाये की उसकी पत्नी कभी किसी और को प्यार करती रही हो तो क्या वह उसे कभी दिल से अपना पायेगा, तो भला वह अपनी बेटी के लिए किसी दूसरे इन्सान से ये उम्मीद कैसे कर सकता है.
शायद इतने कारण काफी है उसे अपने फैसले पर दोबारा सोचने के लिए... मगर खुदगर्जी में डूबा बाप इतना कहाँ सोच पाता है, बस उसका प्यार कोई उससे छीने उसे बर्दास्त नहीं और अपनी इस जीत को हासिल करने के लिए अगर बेटी कि जिन्दगी बर्बाद होती है तो परवाह नहीं. हां उसकी
कसक तो भर गयी. और बेटी ने भी कुछ पलों लिए एक अच्छी बेटी बन कर अपने प्यारे पापा के सारे फैसले को कबूल कर गयी शायद उसे भी पापा कि बातो पर यकीं था कि हां वक्त के साथ सब कुछ ठीक हो जायेगा, प्रेमी की कमी पति से भर जाएगी, तब उसके पापा भी खुश... परिवार भी खुश... उसके चाहने वाले हर शख्स खुश.... दुआए होगी हर किसी की जुबान पर कि हर माँ-बाप को ऐसी ही बेटी मिले.
फैसला हो चुका था.... तीर कमान से निकल चुका था... कोई रास्ता नहीं था कि वापस लौटने का.
सगाई हुई तो होने वाले पति महोदय को होने वाली पत्नी से बात करने की ललक हुई और प्रेमिका एक पत्नी बन कर पागल हो उठी उनका साथ देने के लिए.... एक बार फिर बातो का सिलसिला शुरू हुआ... ठीक वैसे ही जैसे बेटी की पहले काफी रातें गुज़र चुकी थी.
प्यार की बातें की गयी..... सपनो की बातें की गयी.... भविष्य की बातें की गयी..... उस समय होने वाले नए बर-बधू में से किसी को होश न था कि अतीत की ओर घूम कर देखा जाये. बस हर ओर खुशिया ही खुशिया नज़र आ रही थी. दोनों के सामने एक खुबसूरत संसार था एक-दूसरे को प्यार लुटाने के लिए.......रोया तो बस बीच रास्ते में छोड़ा गया अजनवी शख्स.... न सपने बचे... न हमराही.. बची है तो बस फूट -फूट कर अकेले में रोने के लिए यादें... न आगे किनारा था न पीछे, उसकी भीगी आँखों के सामने बस सूनापन का एक असीमित समुन्दर बिखरा हुआ नज़र आ रहा था. कई बार सोचता क्या सच में वह उसे भूल गयी होगी? शायद हाँ! अचानक दिल के किसी कोने से आवाज आती... फिर याद रखने की कोई वजह भी तो न थी. भरे हुए गिलास में आस पास जमीं पर बिखरे गंदे पानी के लिए जगह ही कहाँ होती है.
कुछ वक्त गुज़रा तो बातो का सिलसिला थमने सा लगा.. कब तक चलती रहती सपनो और भविष्य की बातें.... वक्त की निगाहे धूमी.... अपनी बातो में रूचि को कायम रखने के लिए आखिर भविष्य की बातो से थक हर कर उन्हें अतीत की ओर लौटना पड़ा...
नया नया प्यार है-- विश्वसनीयता जरुरी है.... शायद एक अच्छी बेटी को प्यारे पापा ने शिखाया रहा होगा. और माँ ने बताया होगा उसे मांग के सिंदूर की कीमत.
बातो का सिलसिला अपनी रफ़्तार में था की अचानक पति ने अपनी होने वाली पत्नी को उसके सिंदूर की कसम दे डाली, साथ में विश्वास दिलाया कि उसे परवाह नहीं उसकी पत्नी के अतीत से...
पत्नी का नया गुमान था उसका सिंदूर... और उससे भी ज्यादा अहम थी उसकी कीमत... एक पल से ज्यादा वक्त नहीं लगा अतीत की हकीकत को बयां करने में... कुछ तो सिंदूर की कीमत का अहसास था और कुछ अपनी अहमियत का तबका, .......अजी ये जान लो हम भी पारो से काम न थे, ये बात और है की हमे देवदास की परवाह न थी. हम तो उसे रास्ते पे ही छोड़ आये.
उसके शब्दों की कशमकश के साथ एकाएक वक्त थम गया और शुरुवात हुई उस त्राशदी की जिसकी कल्पना उसके खुदगर्ज बाप ने नहीं की थी और अगर की भी थी तो उसकी खुदगर्जी से ज्यादा उसके लिए अहमियत नहीं रखती थी......बेरुखी... बेकशी...
पत्नी अब एक बार फिर प्रेमिका बनना चाहती थी... कोशिश भी की... बनी भी... मगर ठहराव न था... हर तरफ बस ताने.... पति के ताने.... प्रेमी के ताने... हाँ बाप अब भी साथ था उसकी बर्बादी के सफ़र में...
इस कदर डूबी बाप के खुदगर्जी के समुन्दर में, कि वह फिर किसी से भी वफ़ा न कर पाई... न पति से, न प्रेमी से और न ही खुद बाप से.
अक्सर सुना जाता जाता है की जिन्दगी के २ किनारे होते है... मगर उस वेवफा बेटी की जिन्दगी में किनारों की कमी न थी हाँ ये बात और थी की ठहराव कही नहीं बचा था. न समाज की तरफ, न पति की तरफ, न प्रेमी की तरफ और न ही अपने परिवार की तरफ.
शादी इस लिए नहीं तोड़ सकती थी कि सामने समाज कि रुश्वाइया थी, पति को इस लिए नहीं छोड़ पाई कि अब अकेला वही जीने का सहारा था, प्रेमी से रिश्ता इस लिए नहीं तोड़ पाई कि जिन्दा रहने के लिए किसी के प्यार की जरुरत थी. और परिवार ..... लोगो की गन्दी नजर से बचने के लिए एक दीवार,
हैरानी की बात ये थी की ये तीनो अलग -अलग किनारे थे जो कभी मिल नहीं सकते. फिर वह न तो एक अच्छी बेटी बन पाई, न पत्नी, न बहू और नहीं एक अच्छी प्रेमिका.
जिन्दगी बद से बदतर होती चली गयी.... मगर बाप की खुदगर्जी थमी नहीं, उसकी हसी को तोहफों से खरीदने के लिए जिन्दगी भर कोशिश करता रहा.
एक बाप जो अपनी बेटी को जी जान से प्यार करता है, उसके लिए दुनिया की हर खुसी ला कर उसके कदमो में डाल सकता है और उसे इस बात का भी बखूबी अंदाजा है की उसकी बेटी उसके इस प्यार को अच्छी तरह समझती है और वह भी उसे उतना ही प्यार करती है, उसके साथ उसे रहना पसंद है, हर रात सोने से पहले उसे अपने प्यारे पापा से बात करना पसंद है, अगर उसके प्यारे पापा अपने किसी काम से २ दिन के लिए ही सही बाहर जाते है और उन्हें अचानक बेटी की याद सताती और उसे फ़ोन कर बैठे, तो बेटी की आवाज से साफ पता चलता है की उसे इसी फ़ोन का तो बेसब्री से इंतजार था, आज ये भी पक्का था कि अगर पापा से बात न होती तो उसे नीद नहीं आने वाली थी,
घर में हर सुबह शाम बेटी एक अच्छी बहू की तरह पापा का ख्याल रखती है,
उन्हें चाय कब चाहिए?
कौन सी चीजो से उन्हें परहेज है?
किस दवा को उन्हें कब लेनी है?
अभी उन्हें खाना मिला या नहीं?
क्या -क्या उन्हें पसंद है और क्या नहीं? वगैरा - वगैरा.
फिर जरा रुक कर कल्पना कीजिये..... अचानक बेटी के जिन्दगी में एक अपरचित, अजनवी अंजाना शख्स आता है और बेटी के सारे प्यार का अकेला वारिश बन जाता है. अगर वह शख्स नालायक हुआ तो बाप ने बेटी को प्यार से समझा दिया कि वह ब्यक्ति उसके लायक नहीं है, बेटी को समझ में आ गया तो ठीक है वर्ना जोर जबरजस्ती भी जायज है, आखिर बेटी कि जिन्दगी का सवाल है और यदि लायक हुआ तो रोक टोक कि उतनी गुन्जाईस नहीं होती है. एक बुजुर्ग और बेटी के पापा होने के नाते उन्हें पूरा अंदाजा है कि एक न एक दिन तो कोई आएगा उसकी जिन्दगी में.
लेकिन...... कहानी अभी बाकी है मेरे दोस्त!!!!!!!!
एक दिन अचानक प्यारे पापा को अहसास हुआ कि उनकी अपनी बेटी उनके हाथ से जा चुकी है. आज उनकी दवा सिर्फ इसलिए लेट हुई क्योकि उस समय उन अजनवी महोदय का फ़ोन आया हुआ था जिससे बात करने कि खुसी में बेटी को पापा कि दवा का भी ख्याल नहीं रहा, या फिर शायद बात ये भी ही सकती है कि आज कल बेटी में सोने पहले उनसे बात करने कि आदत न रही हो, क्योंकि रात का एक हिस्सा तो उस अजनवी से बात करने में निकल जाती है, और सुबह बेटी इस उम्मीद में बिस्तर से देर में उठती है कि शायद अभी अभी उसका हमनशी, हमसफ़र हमदर्द नीद से जगा होगा और उसकी अगड़ाई भरती हुई एक मीठी सी आवाज सुनने को मिल जाये और इसी चक्कर में पापा कि चाय फिर लेट हो गयी.
अब तक पापा को शायद इस बात का गम भी सताने लगा था कि एक बेटी जिस पर उन्होंने अपनी हर खुसी लुटा कर उसे पाला, और आज उसकी जिन्दगी में किसी और शख्स कि इतनी अहमियत कैसे हो सकती है. वह सिर्फ उससे बात करने कि खुसी में पापा कि दवा कैसे भूल सकती है,
बाहर से २ दिन बाद लौटने पर जो बेटी दरवाजे पर उनका इंतजार करती हुई मिला करती थी वह अब क्यों याद नहीं रखती कि उसके पापा आज घर लौटने वाले है.
उनकी अपनी बेटी उनके कीमती तोहफों को उतना सहेज कर क्यों नहीं रखती जितना कि उस अजनवी शख्स द्वारा दिए हुए एक मामूली से रुमाल को संभाल कर रखती है.
एक बाप कि खुदगर्जी उसके अन्दर एक वाइरस कि तरह फ़ैलाने लगती है, उसे अब दुनिया कि हर हकीकत एक गुनाह कि तरह दिखती है, उसे इस बात को स्वीकार करने में मुस्किल होना शुरू हो जाती है कि उसकी अपनी बेटी भी एक वैसी ही बेटी है जैसे कि २० साल पहले वह भी किसी के बाप से उसकी बेटी को छीन कर लाया था और बदनशीबी से आज वह उसकी पत्नी है. जिससे वह ये कभी उम्मीद नहीं करता कि वह अपने बाप को अपने पति यानि उससे ज्यादा प्यार करे.
कितनी हैरानी कि बात है कि आज वह खुद इतनी सी बात समझ नहीं पा रहा है कि उसकी बेटी ऐसा कुछ भी नहीं कर रही है जो उसे नहीं करना चाहिए था. उसका पागलपन यही पर रुका नहीं और उसने अपनी ही बेटी के भविष्य के ख्वाबो को सिर्फ अपनी खुदगर्जी में इस कदर रौद डाला कि वह चाह कर भी अपने ख्वाबो के टुकडो समेट न सके.
दोस्तों! उसके पागलपन की हद यहाँ पर थमती नहीं... वह बेटी के भविष्य की दुहाई देकर उसकी शादी कही और करता है कि शायद अब उसकी बेटी उसकी बन कर रहेगी और उसके खुबसूरत शब्दों का जाल कुछ यूँ होता है- कि वह जो कुछ भी कर रहा है अपनी बेटी की ख़ुशी के लिए कर रहा है. उसकी बेटी उस दूसरे इन्सान के साथ ज्यादा खुश रहेगी.
दोस्तों! क्या आप उसकी इस बात पर इतनी आसानी से यकीं कर लोगे? मुझे तो नहीं लगता की आप इतने भी मुर्ख हो सकते हो.
कारण १. जब उसने शुरू में अपनी बेटी को उस अजनवी शख्स की तरफ झुकते हुए देखा तो रोका क्यों नहीं? उसकी सबसे बड़ी गलती...
कारण २. क्या उसे इस बात का अहसास नहीं है की उसकी बेटी का अतीत उसका पीछा नहीं छोड़ने वाला.... मुझे लगता है कि एक सही गलत की पहचान रखने वाले बुद्धिमान बाप को इस बात को समझाने की जरुरत होनी चाहिए
कारण ३. अगर उसे खुद को इस बात का पता चल जाये की उसकी पत्नी कभी किसी और को प्यार करती रही हो तो क्या वह उसे कभी दिल से अपना पायेगा, तो भला वह अपनी बेटी के लिए किसी दूसरे इन्सान से ये उम्मीद कैसे कर सकता है.
शायद इतने कारण काफी है उसे अपने फैसले पर दोबारा सोचने के लिए... मगर खुदगर्जी में डूबा बाप इतना कहाँ सोच पाता है, बस उसका प्यार कोई उससे छीने उसे बर्दास्त नहीं और अपनी इस जीत को हासिल करने के लिए अगर बेटी कि जिन्दगी बर्बाद होती है तो परवाह नहीं. हां उसकी
कसक तो भर गयी. और बेटी ने भी कुछ पलों लिए एक अच्छी बेटी बन कर अपने प्यारे पापा के सारे फैसले को कबूल कर गयी शायद उसे भी पापा कि बातो पर यकीं था कि हां वक्त के साथ सब कुछ ठीक हो जायेगा, प्रेमी की कमी पति से भर जाएगी, तब उसके पापा भी खुश... परिवार भी खुश... उसके चाहने वाले हर शख्स खुश.... दुआए होगी हर किसी की जुबान पर कि हर माँ-बाप को ऐसी ही बेटी मिले.
फैसला हो चुका था.... तीर कमान से निकल चुका था... कोई रास्ता नहीं था कि वापस लौटने का.
सगाई हुई तो होने वाले पति महोदय को होने वाली पत्नी से बात करने की ललक हुई और प्रेमिका एक पत्नी बन कर पागल हो उठी उनका साथ देने के लिए.... एक बार फिर बातो का सिलसिला शुरू हुआ... ठीक वैसे ही जैसे बेटी की पहले काफी रातें गुज़र चुकी थी.
प्यार की बातें की गयी..... सपनो की बातें की गयी.... भविष्य की बातें की गयी..... उस समय होने वाले नए बर-बधू में से किसी को होश न था कि अतीत की ओर घूम कर देखा जाये. बस हर ओर खुशिया ही खुशिया नज़र आ रही थी. दोनों के सामने एक खुबसूरत संसार था एक-दूसरे को प्यार लुटाने के लिए.......रोया तो बस बीच रास्ते में छोड़ा गया अजनवी शख्स.... न सपने बचे... न हमराही.. बची है तो बस फूट -फूट कर अकेले में रोने के लिए यादें... न आगे किनारा था न पीछे, उसकी भीगी आँखों के सामने बस सूनापन का एक असीमित समुन्दर बिखरा हुआ नज़र आ रहा था. कई बार सोचता क्या सच में वह उसे भूल गयी होगी? शायद हाँ! अचानक दिल के किसी कोने से आवाज आती... फिर याद रखने की कोई वजह भी तो न थी. भरे हुए गिलास में आस पास जमीं पर बिखरे गंदे पानी के लिए जगह ही कहाँ होती है.
कुछ वक्त गुज़रा तो बातो का सिलसिला थमने सा लगा.. कब तक चलती रहती सपनो और भविष्य की बातें.... वक्त की निगाहे धूमी.... अपनी बातो में रूचि को कायम रखने के लिए आखिर भविष्य की बातो से थक हर कर उन्हें अतीत की ओर लौटना पड़ा...
नया नया प्यार है-- विश्वसनीयता जरुरी है.... शायद एक अच्छी बेटी को प्यारे पापा ने शिखाया रहा होगा. और माँ ने बताया होगा उसे मांग के सिंदूर की कीमत.
बातो का सिलसिला अपनी रफ़्तार में था की अचानक पति ने अपनी होने वाली पत्नी को उसके सिंदूर की कसम दे डाली, साथ में विश्वास दिलाया कि उसे परवाह नहीं उसकी पत्नी के अतीत से...
पत्नी का नया गुमान था उसका सिंदूर... और उससे भी ज्यादा अहम थी उसकी कीमत... एक पल से ज्यादा वक्त नहीं लगा अतीत की हकीकत को बयां करने में... कुछ तो सिंदूर की कीमत का अहसास था और कुछ अपनी अहमियत का तबका, .......अजी ये जान लो हम भी पारो से काम न थे, ये बात और है की हमे देवदास की परवाह न थी. हम तो उसे रास्ते पे ही छोड़ आये.
उसके शब्दों की कशमकश के साथ एकाएक वक्त थम गया और शुरुवात हुई उस त्राशदी की जिसकी कल्पना उसके खुदगर्ज बाप ने नहीं की थी और अगर की भी थी तो उसकी खुदगर्जी से ज्यादा उसके लिए अहमियत नहीं रखती थी......बेरुखी... बेकशी...
पत्नी अब एक बार फिर प्रेमिका बनना चाहती थी... कोशिश भी की... बनी भी... मगर ठहराव न था... हर तरफ बस ताने.... पति के ताने.... प्रेमी के ताने... हाँ बाप अब भी साथ था उसकी बर्बादी के सफ़र में...
इस कदर डूबी बाप के खुदगर्जी के समुन्दर में, कि वह फिर किसी से भी वफ़ा न कर पाई... न पति से, न प्रेमी से और न ही खुद बाप से.
अक्सर सुना जाता जाता है की जिन्दगी के २ किनारे होते है... मगर उस वेवफा बेटी की जिन्दगी में किनारों की कमी न थी हाँ ये बात और थी की ठहराव कही नहीं बचा था. न समाज की तरफ, न पति की तरफ, न प्रेमी की तरफ और न ही अपने परिवार की तरफ.
शादी इस लिए नहीं तोड़ सकती थी कि सामने समाज कि रुश्वाइया थी, पति को इस लिए नहीं छोड़ पाई कि अब अकेला वही जीने का सहारा था, प्रेमी से रिश्ता इस लिए नहीं तोड़ पाई कि जिन्दा रहने के लिए किसी के प्यार की जरुरत थी. और परिवार ..... लोगो की गन्दी नजर से बचने के लिए एक दीवार,
हैरानी की बात ये थी की ये तीनो अलग -अलग किनारे थे जो कभी मिल नहीं सकते. फिर वह न तो एक अच्छी बेटी बन पाई, न पत्नी, न बहू और नहीं एक अच्छी प्रेमिका.
जिन्दगी बद से बदतर होती चली गयी.... मगर बाप की खुदगर्जी थमी नहीं, उसकी हसी को तोहफों से खरीदने के लिए जिन्दगी भर कोशिश करता रहा.
Sunday, June 20, 2010
आत्मविश्वाश
आत्मविश्वाश मेरी सबसे बड़ी शक्ति है। मै जनता हू की अगर मै kइसी काम की शुरुवात कर दुगा तो मजबूरी के चलते ही सही मुझे उस काम का अंत करना भी आ जायेगा मुझे।
में एंड माय वे
दुसरो की अनकही बेरुखी अक्सर मुझे जिन्दगी को गलत तरीके से जीने के लिए विवश कर देती है।
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