Wednesday, August 25, 2010

आता हुआ दरिया जाता हुआ दरिया भी है

मुझे याद है
तब से आज भी
कितनी बलिष्ठ भुजाये थी ओ.
ऊचा कद, जिन पे  कुदराया करता था मै.
ओ प्यार बरसाती आँखे,
मेरी जरा सी अस्वस्थता पर आंसू उलेड़ पड़ती थी.
मुझे वह पल भी याद है
एक बार जब मेरी शैतानी पर लाल हुई थी आंखे
टूट कर पड़ी थी मेरे बदन पे उनकी भुजाये
चरमरा उठा  था पूरा बदन.
उफ़! आनंद आज वो उतनी शसक्त क्यप नहीं है?
कौन जानता था क़ि...
आता हुआ दरिया जाता हुआ दरिया भी है

वो भुजाये, बलिष्ठ बदन,
आहिष्ट आहिष्ट मेरी ही आँखों के सामने,
मुझी से चुरा कर अपनी बलिष्ठता खोता रहा
और मै तमाशे  क़ि तरह उसे देखता रहा
उफ़! आनंद!! कहाँ खबर थी किसी को?
तुम इतने बुद्दू हो..शायद उदार भी
कौन जानता था क़ि..
आता हुआ दरिया जाता हुआ दरिया भी है

फिर वो भुजाये . नो बदन
जर्जर होता गया मैंने महसूस भी किया
शायद उन्होंने भी..
कोई कुछ नहीं बोला, देखते रहे वक्त क़ि ददागिरी को
जैसे जानते थे क़ि ऐसा होना ही था
उफ़! आनंद!! तुम इतना लाचार थे
तुम्हे तो पता था क़ि ऐसा नहीं होना था
काश तुमने कहा होता क़ि मै जनम न लूगा
मै नहीं देखूगा इतनी लाचारी को
कौन जानता था क़ि..

आता हुआ दरिया जाता हुआ दरिया भी है

अब तो दांत गिर रहे है,
मसूड़े खली हो रहे है
मुह चिपट रहा है
आँखे धस रही है
वोह! पिता जी क्या आप ऐसे ही थे?
मै जवान हो गया, बलिष्ठं भी
तब भी लाचार ही
आपको देख रहा हू जर्जर होते हुए
वक्त के साथ तिनका सा बहते हुए
उफ़! आनंद! निकम्मे आनंद!
वक्त से लड़ने के लिए हाथ तो उठाते
एहसास होता क़ि तुम पित्रभक्त हो
कौन जानता था क़ि..
आता हुआ दरिया जाता हुआ दरिया भी है
तुम्हे पाता है आनंद? तुम कल भी लाचार होगे.
इतना ही... बिलकुल ऐसे ही.
पिता जी छोड़ देगें..
हमें, तुम्हे, दुनिया को, सबको.
जैसे दादा जी छोड़ कर गए थे
गम हो जायेगे अथाह आकाश में
साथ में बदन भी न होगा उनके
बिलकुल अकेले.. निश्तब्ध स्वर में
उड़ जायेगे कही
बचेगी तुम्हारी भीगी आँखे, लचर चेहरा
उनकी यादें, बलिष्ठ भुजाये, ऊचा कद
जो निराधार पड़ा होगा सामने
उफ़! आनंद, निकम्मे आनंद!
तुम लचर rahoge
कौन जानता था क़ि..

आता हुआ दरिया जाता हुआ दरिया भी है

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