तू न आई, तेरी वफ़ा न आई,
वेवफा तेरी याद आ गयी.
तूने न अपनी खबर भेजी, न हमने खबर लेने की कोशिश की.
तुम्हारे पास साथ था
तुम्हारे तीसरे चौथे या पाचवें प्रेमी या होने वाले पति का
और मेरे पास मेरा अथाह सूनापन, मेरे आंसू और मेरा काम.
कितने दिन गुज़र गए यू ही तेरी यादो से दूर रह कर.
न जाने आज की ये कैसी सुबह थी,
हवाए शायद अपना रुख बदल बैठी
तेरे शहर की ओर से मेरे शहर की ओर चलने लगी.
ओ भी बेहद नम....
उनमे नमी थी तेरी यादों की.
मै हर रोज की तरह ही आज भी निकला था
बेख़ौफ़... बेपरवाह... खुले आसमान के नीचे.
उफ़! पूरा बदन भीग गया, वेवफा तेरी यादों की नमी से...
फिर सूरज भी निकला, धूप भी खिली
मगर फिर भी न सूख पाई मेरी आँखों की नमी.
तेरे पास साथ भी है, हमराह भी है
साथी भी है हमसफ़र भी है,
उफ़! तेरी किस्मत!!!
एक को छोड़ा दूसरा मिला,
दुसरे को छोड़ा तीसरा मिला,
तीसरे को छोड़ा तो चौथा मिला....
और तेरी किस्मत पे हैरानी तब और भी होती है
जब सोचता हू तेरी मासूमियत के बारे में....
तेरी शख्शियत के बारे में.....
हर शख्स मर मिटा तेरी मासूमियत पे
मगर तेरी मासूमियत और तेरी शख्शियत की दीवार आज भी उतनी ही गौरवपूर्ण है
जितनी शुरुवात में थी.
मज़बूत चट्टाने भी धीरे धीरे कर के टूट जाती,
मगर तेरी शख्शियत.... ओ नहीं टूटने वाली.
काश कभी कोई तुझे भी छोड़ा होता.
कोई दर्द मिला होता तुझे भी मेरी तरह
कोई वेवफाई करता तुझसे तेरी तरह
तुझे क्यों नहीं छोड़ा कभी किसी ने ?
एक हैरानी भरा सवाल है मेरे लिए?
क्या है तुझमे तेरी आवाज के शिवाय?
न हुश्न... न चेहरा... न कद....
ये मुश्किल ही पता चलता की शुरुवात कहा से है और अंत कहाँ? मगर फिर भी... उफ़! दीवानों के दिल क्यों दफ़न होना चाहते हो ऐसी जालिमों के पीछे....
अब छोडो भी उसे,
क्यों बढ़ाते हो ऐसे बेगैरत, बदसूरत इंसानों के हौसले.
क्यों आमंत्रित करते हो उन्हें एक और दिल का क़त्ल करने के लिए.
काश एक बार तुम्हे भी छोड़ता कोई....
तुम ऐसे ही अकेले हो जाते जैसे की मै,
मै जानता हू तुम उस हाथ से उस ईट को तोड़ने में माहिर हो
जिस ईट से दूसरे हाथ लहूलुहान हो जाते है,
तुम उस खतरे से भी खतरनाक हो
जिस खतरे के दूसरे शिकार हो जाते है...
अब इतना कुछ तुम्हारे बारे में जानते हुए मै तुमसे क्या शिकायत करू...
तुमने उसे नहीं चुना जो तुम्हारी जिन्दगी में पहला प्यार बन कर आया था
तो भला मै क्या हू? दूसरा... तीसरा.... क्या हू मै?
आज उसे नाज़ है तुमपे जो तुम्हे जिन्दगी भर के लिए पाने वाला है...
और हो भी क्यों न... ?
तुम हो ही ऐसी,
कोई भी तुमपे नाज करेगा....
मैंने भी किया था...
टूट कर किया था... सीना उठा कर किया था
ये बात और है की आज गर्दन झुक जाती है उनके सामने
जिनसे कभी चिल्ला चिल्ला कर तेरी वफ़ा का सबूत दिया था....
क्यों दिया था मालूम नहीं....
मगर कल्पना में जब भी कल्पना की कल्पना करता,
कल्पना ख़ूबसूरत ही होती...
और इतनी खूबसूरत
जिसके लिए हद से भी ज्यादा खूबसूरत लड़की को नज़र अंदाज किया जा सकता था.
मैंने भी किया और बहुतो को किया.
और उफ़!!!!!!!शायद उन्होंने भी तुम पर कम नाज न किया होगा
जो तुम्हारी जिन्दगी में मुझसे पहले आ चुके थे.
फ़ोन पे किसी की शक्ल थोड़े दिखती है
और जो सुनाई देती है उसमे तुम्हारा कोई जवाब नहीं....
कोई भी दीवाना हो जायेगा तुम्हारी आवाज सुन कर...
और तुमने अपनी इस मजबूत आधार का बखूबी इस्तेमाल किया.
और बात जब जब भी असल मुद्दे तक पहुचती
तब तक जिन्दगी की नाव नदी का आधा हिस्सा पार कर चुकी होती है...
अब जाये तो किधर?
न लौट सकता है...
और न बढ़ सकते है....
बस यू ही देखते रहे मजधार में जिन्दगी को डूबते हुए
ओह बेवफा तेरी याद आ गयी...


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