Wednesday, July 28, 2010

उफ़! कितना हैरान हू मै.

उफ़! कितना हैरान हू मै.... अपने आप से. अपने प्यार से, अपनी वफ़ा से.
दिमाग कितनी बार उकसाता है मुझे उस वेवफा को गली देने के लिए, मगर दिल..... मुझे हर बार एहसास दिलाता है -कि कम्बक्त! वह प्यार है तुम्हारा, आज  किसी और की हो गयी तो क्या हुआ? क्या था जो तुमसे छीन कर ले गयी. कुछ नहीं... कुछ भी नहीं... उसने बस तुम्हे दिया ही दिया है... कभी न ख़त्म होने वाली यादें. अगर जी सकते हो और जीने का तरीका मालूम है तो काफी  है वो जीने के लिए.
             क्यों खफा होते हो जब वह किसी और का जिक्र करती है? ये क्यों नहीं सोचते तुम उससे पहले हो जिसका वो जिक्र करती है.... खुद को ये क्यों यकीं नहीं दिलाते कि तुम्हारा कद उससे बड़ा है जिससे वो तुम्हारी तुलना करती है. मुझे नहीं लगता कि हर वह शख्स तुम्हे पसंद या फिर प्यार करे जिसे तुम करते हो तब ये उम्मीद उससे क्यों?
तुम उसे प्यार करते हो ये तुम्हारी अपनी भावना है. वह तुम्हे बीच रास्ते में छोड़ कर किसी और को अपना लिया ये उसकी फितरत है, तो तुम  इस लिए क्यों परेशां होते हो कि वह किसी और की हो गयी जब कि उसे  परवाह तक नहीं कि तुम गैर हो गए.
          अगर समझ सकते हो तो कुछ इस तरह से समझो कि तुम्हे अपने बेटे के भविष्य पर इन्वेस्टमेंट करना है वह भले ही तुम्हारे बुढ़ापे के बारे में न सोचे. हां ऊम्मीद करना लाज़मी है मगर उस पर आंसू बहाना नासमझी है.
हम उसके थे... है... और  रहेगे इस बात के लिए प्रयत्न करना तुम्हारी वफ़ा को साबित करती मगर उससे वफ़ा कि उम्मीद करना तुम्हारी खुदगर्जी है.
           उफ़! कितनी बड़ी- बड़ी बातें  करता है न दिल! काश इसे पता होता कि कितनी तकलीफ होती है जब कोई इस तरह वेवफाई करता है. वह शख्स जिसने आपको जिन्दगी के तमाम सपने दिखाए हो और फिर वही उनका क़त्ल कर दे. उफ़! फिर कितनी देर लगेगी उसका  क़त्ल करने में अगर कर पाते तो.
उफ़ कितना हैरान हू मै?



        

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