Thursday, June 24, 2010

एक वेवफा क्यों नहीं कर सकती वफ़ा?

         एक वेवफा क्यों नहीं कर सकती वफ़ा?  सोचने को तो कुछ भी सोचा जा सकता है मगर कारण  सिर्फ एक है - बाप की खुदगर्जी! जी हाँ, मै यकीं से इस बात को कह सकता हू.  और साबित भी कर सकता हू.
        एक बाप जो अपनी बेटी को जी जान से प्यार करता है, उसके लिए दुनिया की हर खुसी ला कर उसके कदमो में डाल सकता है और उसे इस बात का भी बखूबी अंदाजा है की उसकी बेटी उसके इस प्यार को अच्छी तरह समझती है और वह भी उसे उतना   ही प्यार करती है, उसके  साथ उसे रहना पसंद है,  हर रात  सोने से पहले  उसे  अपने प्यारे पापा से बात करना पसंद है,  अगर उसके प्यारे पापा अपने किसी काम से २ दिन के लिए ही सही बाहर  जाते है और उन्हें अचानक बेटी की याद  सताती  और उसे फ़ोन कर बैठे, तो बेटी की आवाज से साफ पता चलता है की उसे इसी फ़ोन का तो बेसब्री से इंतजार था, आज ये भी पक्का था कि अगर पापा से बात न होती तो उसे  नीद नहीं आने वाली थी,
            घर में हर सुबह शाम  बेटी एक अच्छी बहू की तरह पापा का ख्याल रखती है,
 उन्हें चाय कब चाहिए?
कौन सी चीजो  से उन्हें परहेज है?
किस दवा को उन्हें कब लेनी है?
अभी उन्हें खाना मिला या नहीं?
क्या -क्या उन्हें पसंद है और क्या नहीं?  वगैरा - वगैरा.
              फिर जरा रुक कर कल्पना कीजिये.....  अचानक बेटी के जिन्दगी में एक अपरचित, अजनवी अंजाना शख्स आता है और बेटी के सारे प्यार का अकेला वारिश बन जाता है.   अगर वह शख्स नालायक हुआ तो बाप ने बेटी को प्यार से समझा दिया  कि वह ब्यक्ति उसके लायक नहीं है, बेटी को समझ में आ गया तो ठीक है वर्ना जोर जबरजस्ती भी जायज है, आखिर बेटी कि जिन्दगी का सवाल है और यदि  लायक हुआ  तो रोक टोक कि उतनी गुन्जाईस नहीं होती है.  एक बुजुर्ग और बेटी के पापा होने के नाते उन्हें पूरा अंदाजा है कि एक न एक दिन तो कोई आएगा उसकी जिन्दगी में.

लेकिन...... कहानी अभी बाकी है मेरे दोस्त!!!!!!!!
                
               एक दिन अचानक प्यारे पापा को अहसास हुआ कि उनकी अपनी बेटी उनके हाथ से जा चुकी है.  आज उनकी दवा  सिर्फ इसलिए  लेट हुई क्योकि उस समय उन अजनवी महोदय  का फ़ोन आया हुआ था जिससे  बात करने कि खुसी में बेटी को पापा कि दवा का भी ख्याल नहीं रहा,  या फिर शायद बात ये भी ही सकती है कि आज कल बेटी में सोने पहले उनसे बात करने कि आदत न रही हो,  क्योंकि  रात का एक हिस्सा तो उस अजनवी से बात करने में निकल जाती  है, और सुबह  बेटी इस उम्मीद में बिस्तर से देर में उठती है कि शायद अभी अभी उसका हमनशी, हमसफ़र हमदर्द नीद से जगा होगा और उसकी अगड़ाई  भरती हुई एक मीठी सी आवाज  सुनने  को मिल जाये और इसी चक्कर में पापा कि चाय फिर लेट हो गयी.
अब तक पापा को शायद इस बात का गम भी सताने लगा था कि एक बेटी जिस पर  उन्होंने अपनी हर खुसी लुटा कर उसे पाला, और आज उसकी जिन्दगी में किसी और शख्स कि इतनी अहमियत कैसे हो सकती है. वह सिर्फ उससे बात करने कि खुसी में पापा कि दवा कैसे भूल सकती है,
बाहर से २ दिन बाद लौटने पर जो बेटी दरवाजे पर उनका इंतजार करती हुई मिला करती थी वह अब क्यों याद नहीं रखती कि उसके पापा आज घर  लौटने वाले है.
            उनकी अपनी बेटी उनके कीमती तोहफों को उतना सहेज कर क्यों नहीं रखती जितना कि उस अजनवी शख्स द्वारा दिए हुए एक मामूली से रुमाल को संभाल  कर रखती है.
             एक बाप कि खुदगर्जी उसके अन्दर एक वाइरस कि तरह फ़ैलाने लगती है,  उसे अब दुनिया कि हर हकीकत एक गुनाह कि तरह दिखती है, उसे इस बात को स्वीकार करने में मुस्किल होना शुरू हो जाती है कि उसकी अपनी बेटी  भी एक वैसी  ही बेटी है जैसे कि २०  साल पहले वह भी किसी के बाप से उसकी बेटी को छीन कर लाया था और बदनशीबी से आज वह उसकी पत्नी है. जिससे वह ये कभी उम्मीद नहीं करता कि वह अपने बाप को अपने पति यानि उससे ज्यादा प्यार करे.
             कितनी हैरानी कि बात है कि आज वह खुद इतनी सी बात समझ नहीं पा रहा है कि उसकी बेटी ऐसा कुछ भी नहीं कर रही है जो उसे नहीं करना चाहिए था. उसका पागलपन यही पर रुका नहीं और उसने अपनी ही बेटी के भविष्य के ख्वाबो  को सिर्फ अपनी खुदगर्जी में इस कदर रौद डाला कि वह चाह  कर भी अपने ख्वाबो के टुकडो समेट न सके.
            दोस्तों! उसके पागलपन की हद यहाँ पर थमती नहीं...  वह बेटी के भविष्य की दुहाई देकर उसकी शादी कही और करता है कि शायद अब उसकी बेटी उसकी बन कर रहेगी और उसके खुबसूरत शब्दों का जाल  कुछ यूँ होता है- कि वह जो कुछ भी कर रहा है अपनी बेटी की ख़ुशी के लिए कर रहा है. उसकी बेटी उस दूसरे  इन्सान के साथ ज्यादा खुश रहेगी.
              दोस्तों! क्या आप उसकी इस बात पर इतनी आसानी से यकीं कर लोगे?  मुझे तो नहीं लगता की आप इतने भी मुर्ख हो सकते हो.

कारण १. जब उसने शुरू में अपनी बेटी को उस अजनवी शख्स की तरफ झुकते हुए देखा तो रोका क्यों नहीं? उसकी सबसे बड़ी गलती...

कारण २. क्या उसे इस बात का अहसास नहीं है की उसकी बेटी का अतीत उसका पीछा नहीं छोड़ने वाला.... मुझे लगता है कि एक सही गलत की पहचान रखने वाले बुद्धिमान बाप को इस बात को समझाने की जरुरत होनी चाहिए

कारण ३. अगर उसे खुद को इस बात का पता चल जाये की उसकी पत्नी कभी  किसी और को प्यार करती रही हो तो क्या वह उसे  कभी दिल से अपना पायेगा, तो भला वह अपनी बेटी के लिए किसी दूसरे इन्सान से ये उम्मीद कैसे कर सकता है.

              शायद इतने कारण काफी है उसे अपने फैसले पर दोबारा सोचने के लिए... मगर खुदगर्जी में डूबा बाप इतना कहाँ  सोच पाता है,  बस उसका प्यार कोई उससे छीने उसे बर्दास्त नहीं और अपनी इस जीत को हासिल करने के लिए अगर बेटी कि जिन्दगी बर्बाद होती है तो परवाह नहीं.  हां उसकी
 कसक तो भर गयी. और  बेटी ने भी कुछ पलों लिए  एक अच्छी बेटी बन कर अपने प्यारे पापा के सारे फैसले को कबूल कर गयी शायद उसे भी पापा कि बातो पर यकीं था कि हां वक्त के साथ सब कुछ ठीक हो जायेगा, प्रेमी की कमी पति से भर जाएगी,  तब उसके पापा भी खुश... परिवार भी खुश... उसके चाहने वाले हर शख्स खुश.... दुआए होगी हर किसी की जुबान पर कि हर माँ-बाप को ऐसी ही बेटी मिले.
          फैसला हो चुका  था.... तीर कमान से निकल चुका था... कोई रास्ता नहीं था कि वापस लौटने का.
          सगाई हुई तो होने वाले पति महोदय को होने वाली पत्नी से बात करने की ललक हुई और प्रेमिका एक पत्नी बन कर पागल हो उठी उनका साथ देने के लिए.... एक बार फिर बातो का सिलसिला शुरू हुआ... ठीक  वैसे ही  जैसे बेटी की  पहले काफी रातें गुज़र चुकी थी.
           प्यार की बातें की गयी..... सपनो की बातें की गयी.... भविष्य की बातें की गयी..... उस समय होने वाले नए बर-बधू में से किसी को होश न था कि अतीत की ओर घूम कर देखा जाये. बस हर ओर खुशिया ही खुशिया नज़र आ रही थी. दोनों के सामने एक खुबसूरत संसार था एक-दूसरे को प्यार लुटाने के लिए.......रोया तो बस बीच रास्ते में छोड़ा गया अजनवी शख्स.... न सपने बचे... न हमराही..  बची है तो बस फूट -फूट कर अकेले में रोने के लिए यादें... न आगे किनारा था न पीछे,  उसकी भीगी आँखों के सामने बस सूनापन का एक असीमित समुन्दर बिखरा हुआ नज़र आ रहा था. कई बार सोचता क्या सच में वह उसे भूल गयी होगी? शायद हाँ! अचानक दिल के किसी कोने से आवाज आती...  फिर याद रखने की कोई वजह भी तो न थी. भरे हुए गिलास में आस पास जमीं पर बिखरे  गंदे पानी के लिए जगह ही कहाँ होती है.
            कुछ वक्त गुज़रा तो  बातो का सिलसिला थमने सा लगा.. कब तक चलती रहती सपनो और भविष्य की बातें.... वक्त की निगाहे धूमी.... अपनी बातो में रूचि को कायम रखने के लिए आखिर भविष्य की बातो से थक हर कर उन्हें अतीत की ओर लौटना  पड़ा...
            नया नया प्यार है-- विश्वसनीयता जरुरी है.... शायद एक अच्छी बेटी को प्यारे पापा ने शिखाया रहा होगा. और माँ ने बताया होगा उसे मांग के सिंदूर की कीमत.
            बातो का सिलसिला अपनी रफ़्तार में था की अचानक पति ने अपनी होने वाली पत्नी को उसके सिंदूर की कसम दे डाली, साथ में विश्वास दिलाया कि उसे परवाह नहीं उसकी पत्नी के अतीत से...
पत्नी का नया गुमान था उसका सिंदूर... और उससे भी ज्यादा अहम थी उसकी कीमत... एक पल से ज्यादा वक्त नहीं लगा अतीत की हकीकत को बयां करने में...  कुछ तो सिंदूर की कीमत का अहसास था और कुछ अपनी अहमियत का तबका,  .......अजी ये जान लो हम भी पारो से काम न थे, ये बात और है की हमे देवदास की परवाह न थी. हम तो उसे रास्ते पे ही छोड़ आये.
           उसके शब्दों की कशमकश के साथ एकाएक  वक्त  थम गया और शुरुवात हुई उस त्राशदी की जिसकी कल्पना उसके खुदगर्ज बाप ने नहीं की थी और अगर की भी थी तो उसकी खुदगर्जी से ज्यादा उसके लिए अहमियत नहीं रखती थी......बेरुखी... बेकशी...
            पत्नी अब एक बार फिर प्रेमिका बनना चाहती थी... कोशिश भी की... बनी भी... मगर ठहराव न था... हर तरफ बस ताने.... पति के ताने.... प्रेमी के ताने... हाँ बाप अब भी साथ था उसकी बर्बादी के सफ़र में...
             इस कदर डूबी बाप के खुदगर्जी के समुन्दर में, कि वह फिर किसी से भी वफ़ा न कर पाई... न पति से,  न प्रेमी से और न ही खुद बाप से.
अक्सर सुना जाता जाता है की जिन्दगी के २ किनारे होते है... मगर उस वेवफा  बेटी की जिन्दगी में किनारों की कमी न थी हाँ ये बात और थी  की ठहराव कही नहीं  बचा था. न समाज की तरफ, न पति की तरफ, न प्रेमी की तरफ और न ही अपने परिवार की तरफ.
          शादी इस लिए नहीं तोड़ सकती थी कि सामने समाज कि रुश्वाइया थी, पति को इस लिए नहीं छोड़ पाई कि अब अकेला वही जीने का सहारा था, प्रेमी से  रिश्ता इस लिए नहीं तोड़ पाई कि जिन्दा रहने के लिए किसी के प्यार की जरुरत थी. और परिवार ..... लोगो की गन्दी नजर से बचने के लिए एक दीवार,
            हैरानी की बात ये थी की ये तीनो अलग -अलग किनारे थे जो कभी मिल नहीं सकते. फिर वह न तो एक अच्छी बेटी बन पाई, न पत्नी, न बहू और नहीं एक अच्छी प्रेमिका.
             जिन्दगी बद से बदतर होती चली गयी.... मगर बाप की खुदगर्जी थमी नहीं, उसकी हसी को तोहफों से खरीदने के लिए जिन्दगी भर कोशिश करता रहा.

2 comments:

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  2. raji aapne bhut achha likha hai sachmuch ye hi hakikat hai
    really yesa hi hota hai ham aoor aap use chah ke bhi badl nhi sakte bas bhut karege to char line kuch likh lege iske alava kuch nhi kar sakte kuch bhi nhi

    sab kuch sahna hmari majburi hoti hai
    lekin bevfa keval aoort hi nhi purush bhi hote hai kab kise badl jaye kuch kha nhi ja sakta

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