Tuesday, January 20, 2015

.....अब तो छुप जाते हैं गुनाह भी उनके मेरे गुस्से की आड़ में।

बड़े सलीके से फैलाई है खबर कि गुस्सा-ए -मिज़ाज़ हूँ मैं। 
अब तो छुप जाते हैं गुनाह भी उनके मेरे गुस्से की आड़ में। 

......वरना तेरी शराफत पर यकीं है मुझे भी और शरीफो की तरह।

जुर्म करके भी आती नही शिकन तेरे चेहरे पर बस यही शिकायत है,
वरना तेरी शराफत पर यकीं है मुझे भी और शरीफो की तरह। 

जब खामोश थे सब हार कर, मै हार से उलझता रहा।

अलग कर दे जमाने से मेरी हार को ऐ नासमझ ,
जब खामोश थे सब हार कर, मै हार से उलझता रहा।
सर्द थी वो रात मगर मै आग सा जलता रहा।

मना रहा था मातम जमाना, साथ मिल जब हार का,
तलास में नई राह की , मै उम्मीद लिए चलता रहा।
सर्द थी वो रात मगर मै आग सा जलता रहा।

नाकाम था पर ठहरा नही और हार कर भी हारा नहीं,
बढ़ता रहा हौसला इधर और दिन उधर ढलता रहा। 
सर्द थी वो रात मगर मै आग सा जलता रहा।

हार की न जीत की, ये हौशले की जंग थी,
बंद थी मुट्ठी मेरी सब रेत सा फिसलता रहा।
सर्द थी वो रात मगर मै आग सा जलता रहा।

धुंध थी अन्धकार था, न-उम्मीद की वो छाव थी
सब खो गया था बादलो में, मै धूप सा निकलता रहा।
सर्द थी वो रात मगर मै आग सा जलता रहा।

बुझ गया सूर्य भी, डूब कर जलधि के प्रवाह में
खामोश थे जब दीप सब, मै बुझ कर भी सुलगता रहा।
सर्द थी वो रात मगर मै आग सा जलता रहा।

जब खो चुका था हर राह मै , जंग के उस मोड़ पर ,
उम्मीद थी अब भी जीत की और हौसला मचलता रहा।
सर्द थी वो रात मगर मै आग सा जलता रहा।

राजेश सिंह "आनन्द "
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..... कि लगता है आपके बर्बाद होते ही ये राजा बनने वाले है.

दोस्तों कितना अनकहा सा सच है.…। 
आज कुछ बयान सुना दिल्ली बीजेपी के नेताओ का…। 
मनोज तिवारी जी का बयान मेरे किसी सुस्त पड़े घाव को यु ही कुरेद गया। 

अभी अभी किरण बेदी जी ने बीजेपी ज्वाइन की है सो कुछ उनके ही दोस्तों को पसंद नहीं आया। 
उन्हें दिल्ली हार जाने से ज्यादा गम इस बात का है कि किसी नए नवेले को उनका सीनियर बना दिया गया.
इन साहब को उनका ब्यक्तित्व नज़र नही आया.…उनकी क्षमता नज़र नहीं आयी.… सबसे ज्यादा वो उम्मीद नज़र नही आई कि इनके आने से पहले दिल्ली का मंज़र कैसा था और आज का मंजर।
नज़र आयी तो बस वो कुर्सी और किसने पहले बीजेपी ज्वाइन की और किसने बाद? इनकी वजह से जनाब की नाक बच सकती है.... ख़याल ही नहीं आया होगा और अगर आया भी होगा तो जालिम ईर्ष्या का क्या करे?
दुनिया की जी हुज़ूरी ही क्या चाकरी तक कर लगे मगर अपनों की नही। मानो नाक तो तभी कटती है जब अपनों का सम्मान कर दोगे।
उन्हें केजरीवाल से ज्यादा खुंदक किरण जी से है कि आखिर वो कैसे उस कुर्सी पर बैठ सकती है? अंदाज भी ऐसा की जैसे उस कुर्सी को बनाने वाले यही जनाब है.

खैर छोड़िए उनकी! अपनी वो जाने और हम बात करते है ऐसे ही उन तमाम लोगो की जो हर रोज कही न कही किसी न किसी रूप में आपसे भी टकराते रहते होगे । ऐसी लोगो की एक खास बात और होती है… ये सामने हो तो मिठास ऐसी की माँ-बाप का रिश्ता छोटा पड़ जाये ..... "आप तो मेरे भाई हो.... आप तो मेरे सच्चे वाले दोस्त हो... और न जाने क्या-क्या। …… . मगर पीछे ! उफ़! कोई कसर नहीं छोड़ते आपको बर्बाद करने मे.... और यकीं मानिये लगन भी ऐसी..... कि लगता है आपके बर्बाद होते ही ये राजा बनने वाले है.

इनका अंदाज देखिये -
जब आप कुछ बेहतर करने की कोशिश कर रहे होगे तो सबसे पहले ये आपको रोकेगे
आप जरा ताकतवर निकले और नहीं रुके तो फिर अगल बगल से पांसे ऐसे फेके जायेगे कि महाभारत का शकुनी और रामायण की मन्थरा इनके सामने बौने नज़र आयेगे.
फिर भी नहीं रुके तो पहले आपकी आपकी बुराइया करना शुरू करेंगे ....
और फिर नफ़रत
अगर अब भी बात नहीं बनी तो नज़रअंदाज़ करना शुरू कर देंगे। जो ऐसे लोगो का सुपरहिट एक्शन होता है.
मजे की बात ये है दोस्तों! कि जब आप कभी सफल होगे सबसे पहले यही लोग बतायेगे की आप उनके कितने अपने है.

और जब तब आप उन्हें नज़र अंदाज करेंगे तो
सच मानिये… यही वो लोग भी है जो सबसे ज्यादा आपकी चापलूसी करने को तत्पर रहेंगे....

नहीं यकीन ? एक साल पहले के मोदी याद है न? और आज के उनके चापलूस भी..... ?

राजेश सिंह "आनंद"