
हम न मिल सके ये भी तुम्हारी मजबूरी थी, दूसरे का दामन थामना पड़ा ये भी तुम्हारी मजबूरी थी और दोनों ही मजबूरी तुम्हारी ही तरफदारी करती है. एक मजबूरी में पापा तुम्हरे खिलाफ थे और दूसरी मजबूरी में साथ थे.
हम न तो तब मजबूर थे की तुमसे शादी न करे और न हीं अब मजबूर है की किसी और से शादी कर ले.
तुम मजबूरी- मजबूरी में अपना घर बसा बैठे और अपनी आज़ादी में अपना घर जला बैठे.
तुम मजबूरी के चलते ही सही किसी और को अपना बैठे और हम अपनी आज़ादी के चलते किसी और के न हो सके.
कुछ वक्त गुज़रा तो तुम्हारी मजबूरी तुम्हे प्यारी लगती चली गयी और मेरी मजबूरी मेरी बर्बादी का सबब बन गयी. तुम मजबूर हो कर भी सब कुछ पा लिया और हम आजाद हो कर सब कुछ खो बैठे.
वेवफा! आखिर तू हार कर भी जीत गयी.
बहुत खुब...दिल की आवाज़ का अंदाज ए बयां बहुत ही खुबसूरत...इस खुबसूरती में जो दर्द छिपा है...उससे भली-भांति महसूस कर सकता हूं तभी मैंने आपकी इन पक्तियों को अपने फेसबुक प्रोफाइल पर साभार के साथ शेयर किया
ReplyDeleteअमित...
thank you amit ji
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