Wednesday, July 14, 2010

प्यार, इश्क और मुहब्बत

उफ़! प्यार, इश्क और मुहब्बत!!!
मोतीचूर के अंदर भरे हुए ऐसे जहर की तरह है जिसको खाने की इच्छा, मौत और उससे होने वाली तकलीफ के अहसास को भी पीछे छोड़  देती है.
दो अजनवी इंसानों का आमना सामना... दिलो की खनखनाहट और आँखों में इशारों का ताना -बाना एक स्वस्थ इन्सान को एक ऐसी बीमारी से ग्रसित कर देते  है कि जिसका दर्द भी दुनिया की तमाम खुसिओ पर भरी पड़ता है. न अपनों की फ़िक्र न खुद की खबर, अपनों के अरमान जलते है तो जलने दो... खुद को मौत आती है तो आने दो मगर वह.....
"उफ़! डूब जाये समुन्दर में सारा जहाँ भी तो गम नहीं,
बस एक पतवार हो दरिया में मेरे महबूब के लिए"
क्या रखा है उसकी पलकों में जिसके उठने का इंतजार वक्त को थाम  लेता है?
क्या रखा है उसकी आँखों में जिसकी एक नज़र बदन के हर तार को छेड़ देती है?
क्या रखा है उसकी मुस्कान पर जिस पर दिल का कतरा - कतरा कुर्बान हो जता है?
घर की तीसरी मंजिल पर बीमार पड़ी माँ की आवाज भी अनसुनी कर दी जाती है जब बीच की दो सीढियों में फैले हुए हुए अँधेरे की कल्पना की जाती है तो फिर ऐसा क्या है महबूब के पहलु में जिसके लिए दो सीढिया क्या, दो जंगल भी पार करने में खौफ नहीं.
हैरानी होती है जब इस बात पर जिक्र किया जाता है....
हैरानी होती है जब इस बात पर सवाल किया जाते है...
मगर हैरानी की हद तब होती है जब हर जिक्र अर्थहीन और हर सवाल बे-जवाब होता है...
उससे मिलने की तमन्ना हर तमन्ना को बेनकाब कर देती है उसे पाने की चाहत हर चाहत तो कमजोर कर देती है, जिन्दगी के सफ़र में जब पीछे मुड कर देखते है तो मुस्किल ही कुछ बचता है इस दुनिया में महबूब के शिवाय,

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