Tuesday, January 20, 2015

जब खामोश थे सब हार कर, मै हार से उलझता रहा।

अलग कर दे जमाने से मेरी हार को ऐ नासमझ ,
जब खामोश थे सब हार कर, मै हार से उलझता रहा।
सर्द थी वो रात मगर मै आग सा जलता रहा।

मना रहा था मातम जमाना, साथ मिल जब हार का,
तलास में नई राह की , मै उम्मीद लिए चलता रहा।
सर्द थी वो रात मगर मै आग सा जलता रहा।

नाकाम था पर ठहरा नही और हार कर भी हारा नहीं,
बढ़ता रहा हौसला इधर और दिन उधर ढलता रहा। 
सर्द थी वो रात मगर मै आग सा जलता रहा।

हार की न जीत की, ये हौशले की जंग थी,
बंद थी मुट्ठी मेरी सब रेत सा फिसलता रहा।
सर्द थी वो रात मगर मै आग सा जलता रहा।

धुंध थी अन्धकार था, न-उम्मीद की वो छाव थी
सब खो गया था बादलो में, मै धूप सा निकलता रहा।
सर्द थी वो रात मगर मै आग सा जलता रहा।

बुझ गया सूर्य भी, डूब कर जलधि के प्रवाह में
खामोश थे जब दीप सब, मै बुझ कर भी सुलगता रहा।
सर्द थी वो रात मगर मै आग सा जलता रहा।

जब खो चुका था हर राह मै , जंग के उस मोड़ पर ,
उम्मीद थी अब भी जीत की और हौसला मचलता रहा।
सर्द थी वो रात मगर मै आग सा जलता रहा।

राजेश सिंह "आनन्द "
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