Monday, December 15, 2014

जीत की उम्मीद पर लड़ता रहता हूँ मैं

बहुत रो लिए तेरे सितम - वो - करम में ऐ जिंदगी , 
अब तो तेरी नुमाइस पर भी खिलखिलाता रहता हूँ मैं। 
कितना डरता था कभी नाराजगी से तेरे , 
अब नाराज करके भी तुझ पर हँसता रहता हूँ मैं। 
प्यार बुझती है तेरी अगर आंशुओं से मेरे, 
प्यासा रखूँगा तुझे अब ठान कर रखता हूँ मैं।
हर कदम तू लड़ाती रही दुनिया भर से मुझे,
हारने पर भी मुस्कुराता रहता हूँ मैं।
खून बहता रहा मेरा , तू मुस्कुराती है
छलनी बदन को भी बार बार सीता रहता हूँ मैं।
देख फिर से खड़ा हूँ जंग - ए - मैदाने तेरे,
हर बार कट कट कर भी जीता रहता हूँ मैं।
ये शख्शियत है मेरी कि तू हराती रही.
जीत की उम्मीद पर लड़ता रहता हूँ मैं।

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